डर

आज़ादी  जब हम कहते हैं कि हम आजाद हो चुके हैंं, तब हम स्वीकार कर रहे होते हैं कि हम गुलाम  बनाये जा चुके थे और तब फिर से गुलाम बनाये जाने की संभावनाओं को देखते हैैं, हो सकता हैै ऐसी संभावना नज़र न आये पर इसका मतलब ये नही की गुलाम बनाये जाने की संभावना पूरे तरीके से खत्म हो चुकी है, नही ऐसा नही है। ज़रूरत है नज़र और समझ को और भी ज़्यादा बारीक करने की और उन सभी गुलाम बनाये जाने की संभावनाओं को जड़ से उखाड़ फेंकने और आज़ादी की और ज़्यादा संभावना को तलाशने और उसे पाने की है। हम्म मुझे पता है ये इतना आसान नही होगा पर याद रहे हमे आसान और कठीन के भूलभुलैया में गुम नही होना है।
आज़ाद मुल्क में भी हर समय आज़ादी को बचाये रखने की लड़ाई लड़नी पड़ती है, इस लड़ाई को लड़ने के लिए किसी हथियार, बम गोले बारूद, की ज़रूरत नही है। आपका आज़ाद ख्याल और निडर होना ही काफी है। अगर आपको डर लगता है, बड़ी ताकतों से, सरकार से, भीड़ से, समाज से या फिर आपकी अपनी ही मौत आपको डराती है तो फिर ये आपके बस की बात नही है और हम्म हक़दार भी नही हैं आप आज़ादी के, क्योंकि डर गुलामी की तरफ बढ़ाया पहला कदम होता है, जो आपके न चाहते हुए भी आज़ादी से बहूत दूर फेंक देती है।
जब आप डरते हैं तब अपनी दोनों नज़रों को नीची कर, आपकी दोनों बाहें सिकुड़ लेते हैं और होठों को भी सील लेते हैं, अब आपको सांस लेने में भी तकलीफ होने लगती है इस तरह से आप घुट घुट के सांस लेते हैं जो घूंट घूंट के मरने के काफी नजदीक है, और सामने खड़ी मौत को देख कर डर जाते हैं, जितना भी डर लें मौत तो आएगी ही, न डरें तो भी आएगी, मौत का आना तय है फिर डरना ही क्यों मौत से।

उखाड़ फेकिये अपने अंदर से हर उस छोटी बड़ी डर को जो डर धर्म, समाज, सरकार, ताकतवर, अमीरी, गरीबी, जाति, तेज़ रोशनी, अंधकार, ... से लगती है। जब आपके अंदर से डर का नामों निशान तक नही होगा तब आप ऊपर आसमान की तरफ देख कर भगवान से भी नज़र से नज़र मिला कर बातें कर सकेंगे, अपनी दोनों बाहों को फैलाकर पूरी दुनिया को खुद में समेट सकते हैं, अब आपके होंठों पर कपकपाहट की जगह आप खिलखिला कर हँस रहे होंगे, अब कुछ भी जो आप महसूस करते हैं बोलने के लिए स्वतंत्र होंगे। आप पाएंगे कि डर को डरा कर आपने खुद को खुद से मिलाया है, वाक़ई ये एहसास लाज़वाब होगा, जो किसी भी तरह का धार्मिक, रंग, पैसा, ताकत,... के आधार पर भेदभाव नही करता है । अब आप खुद में मुक़म्मल हैं, आपसे चारों तरफ खुशबू फैलेगी ऐसी खुशबू जिसे आने वाली पुरखें भी न भुला पाएंगी। फिर क्या फर्क पड़ता है की आप मर जाओ, मर कर भी जिंदा रहोगे उन सबके दिलों में जिन्होंने आपसे आंखों से आंखें मिलाना सीखा है, जिन्होंने अपनी डर को आपके डर के साथ ही दफ़न कर दिया है, जिन्होंने आपसे आज़ादी और गुलामी में फर्क जाना है, जिन्हें पता चला कि उनका डर वास्तविक नही बल्कि काल्पनिक है, जिन्होंने ज़िन्दगी को ज़िंदादिली से जोड़ा है,... उन सब के दिलो में जिंदा रहोगे आप।

फ़र्क़ इससे नही पड़ता कि हम कितने दिनों तक जिंदा रहते हैं बल्कि फर्क इससे पड़ता है कि उनदिनों में हम कितना जीते हैं. किसी के लिए सौ साल भी कम पड़ जाते हैं तो कोई 10 साल में भी कुछ बड़ा कर जाता है, और मौत का क्या वो तो कभी भी आ सकती है, बच्चें हैं तब भी, या जवानी में भी, या फिर बुढ़ापे के साथ, और हम्म मौत को किसी बीमारी के सहारे की ज़रूरत नही होती है, वो तो बस बहाने ढूंढता है. एक्सीडेंट, भूकंप, बाढ़, सर्दी, गर्मी, ... जीते जी भी मर सकते हैं. किसी कमजर्फ को अपने दिल में जगह दे कर देखिए जिंदा लाश न चलने फिरने लगे तो कहिए.



इससे पहले की आप किसी कमजर्फ को दिल से अपना दोस्त या साथी मान ले समय रहते खुद ही के साथ हो लें, वरना वो दिन दूर नही जब मौत जीते जी आपको गले लगा ले. वैसे ये अपने आप में डर है या निडरता मुझे नही पता? लेकिन इसे डर मान कर किसी का बनने या किसी को अपना बनाने से बच जाए और खुद ही को अपना बना ले तो फायदे में रहेंगे आगे जिंदगी आपके इंतजार में खड़ी है वरना रास्ते में उलझ जायेंगे फिर जिंदगी से मुलाकात न हो पाएगी.
अब आप डर को पार कर चुके हो, और यक़ीनन डर के आगे ही जीत है। वो फिल्मी डायलॉग सुना ही होगा "डर के आगे जीत है, और जीत के आगे जितेंद्र"। यदि आपका नाम जितेंद्र नही है तो निराश होने की ज़रूरत नही है क्योंकि अब आप अपना कोई भी नाम रखने के लिये भी स्वतंत्र हैं, ज़रूरी नही की नाम जितेंद्र ही हो, जब पहले से ही अच्छ. नाम में क्या रखा है क्या पता था मुस्कान नाम की लड़की  नुकसान कर जाएगी, कर गई. मजाक कर रहा हूं 😃.

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